Monday, April 11, 2011

लीक पर वे चलें जिनके/ सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़;
हिलती क्षितिज की झालरें
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं

Congress vs Modi

कल श्री अन्ना हजारे के साथ एक अजीब वाक्या हुआ, उन्होंने नरेन्द्र मोदी जी की तारीफ़ क्या करदी, कांग्रेस में भूचाल आ खड़ा हुआ और तरह तरह की बातें मीडिया में कही जाने लगी. पुरजोर के बावजूद भी मैं ये सोचने और समझने में असफल हूँ कि मोदी जी से कांग्रेस को इतनी अधिक घृणा क्यूँ है. एक भाई ने तो यहाँ तक कह दिया कि मोदी जी के हाथ खून से रंगे हैं, उनकी तारीफ़ नहीं होनी चाहिए. अगर गुजरात दंगों में मोदी जी के हाथ खून से रंगे हैं तो फिर कांग्रेस तो पूरी खून में डूबी हुई है, गुजरात दंगों को छोड़ दें तो सभी दंगे कांग्रेस राज में ही तो हुए हैं. इनके मंत्री कमलनाथ को जब अमेरिका कि कोर्ट बुलाती है सिख विरोधी दंगों में तो कांग्रेस का मुंह बंद कैसे हो जाता है. दिवंगत अर्जुन सिंह जी की भोपाल गैस त्रासदी के प्रमुख अभियुक्त को भारत से भगाने में क्या भूमिका थी, इसके बारे में पूरा देश जानता है कांग्रेस के सिवा. सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर आदि अनेक बैठे हैं इसमें. उन्हें क्या कहेंगे? 

Sunday, April 10, 2011

Nadaani

ये दिन भी अजीब हो चले हैं, जाने कहाँ से इक आंधी चली,वहां दिन निकला, यहाँ हम चल पड़े
उठे थे जब याद था कि आज कुछ आराम फरमाएंगे
पर नादानी देखो, आराम में भी ये कविता निकल रहीं हैं.

A Journey just began

 नमस्कार आप सब को प्रणाम, 

आज एक अजीब विडम्बना से गुजर रहा हूँ. भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रहे राष्ट्रव्यापी अभियान की परिणति क्या होगी, ये समझने का गंभीर प्रयास सुबह से मेरे दिलोदिमाग में चल रहा है. अब जब कलम चल ही निकली है तो इसके परिणाम निकलना भी लाजमी है, निकलने भी चाहिए इसमें कुछ गलत भी क्या है. पर गंभीर समस्या ये है की अपनी भाषा में सोचना भी आज कल पाप हो चला है. मैंने तो अपने सम्पूर्ण जीवन को एक उद्देश्य की और लगा दिया है पर साथी मिलेंगे क्या? जबसे वकालत की थी मेरा दिमाग भी अंग्रेजी हो चला था. सोचकर भी न सोच पाया कि क्यूँ हम विदेशी भाषा को इतनी तवज्जो देते हैं. अगर मैं अंग्रेजी में लिखूं, इसमें पढू और इसे बोलूं तो मुझे समझदार समझा जाता है. विश्व की सबसे विलक्षण भाषा संस्कृत और उससे निकली हिंदी आदि भाषाओँ में लिखना तो जैसे पाप है. क्या ये दिमागी भ्रष्टाचार नहीं है. क्या हम खुद को धोखा नहीं दे रहे. आखिर क्यूँ अंग्रेजी लिखने और बोलने से ही इस देश में समझदार पैदा होते हैं. आखिर क्यूँ? 

लगता तो यही है की हम अपनी भाषा और अपनी संस्कृति के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं. नहीं तो हमारा नाम भारत होता विश्व मानचित्र मैं न की इंडिया. जब तक ये मानसिक भ्रष्टाचार और गुलामी नहीं निकलेगी मुझे नहीं लगता कि भारत एक हो जाएगा. भ्रष्टाचार के विरुद्ध सारा देश एक हो गया है मुझे तो इसमें भी शक है. ये भारत १९४२ में एक नहीं हुआ था, २०११ में क्या होगा. लोगों ने ब्रिटिश शाषन के अंत कि आलोचना की थी, श्री अन्ना हजारे के कदम को क्या गंभीरता से लेंगे. फेसबुक नें इसमें बड़ा योगदान दिया, लीबिया, मिस्र, सीरिया आदि के बाद भारत में इसका पूरा प्रयोग हुआ. पर क्या लोग रिश्वत देना बंद कर देंगे? इस आन्दोलन में किसी को स्वामी अग्निवेश से दिक्कत थी, कोई श्री अन्ना हजारे को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एजेंट बताने में तुला था, एक भाई तो किरण बेदी जी को ही गाली देने में तुला था की अन्ना जी भूखे हैं और किरण जी बेशर्मी से जल का पान कर रही हैं. क्या ऐसे हम भारत को जगायेंगे. स्वामी रामदेव के मंच पर आते ही तो जैसे कांग्रेस के लोगों के पेट में उबाल आ गया, कोई उन्हें ढोंगी तो कोई अन्य गाली से संबोधित कर रहा था. क्या ऐसे बदलेगा भारत. 

गाँधी टोपी पहन कर जंतर मंतर पे खड़े हो कर फोटो खिंचवाने वाले लोग भारत को बदलेंगे? जो देश गाँधी को न समझ पाया वो १०० घंटे में बदल जाएगा, मुझे इसमें संदेह है. मेरे एक प्रिय मित्र हैं, जो अक्सर मुझसे झगड़ते हैं की अहिंसा से कुछ नहीं हो सकता, एक बात तो तय है की उनकी जुबान पर ताला लग गया इसके साथ ही. पर परिस्थितियाँ अभी बहुत मुश्किल हैं और लड़ाई बाकी है. ये अन्ना जी ने खुद भी कहा कि ये शुरुआत भर है. भारत को बदलाव कि जरूरत है, ये निश्चित है पर ये फैशन नहीं बदलाव होना चाहिए. तभी ये लड़ाई सार्थक होगी. अपने अन्दर भारतीय को खोजें जो कहीं अमेरिका में जाकर गम हो गया है, ये देश खुद ब खुद बदल जाएगा. सम्मान दीजिये अपनी सोच को, अपनी भाषा को, अपनी वेशभूषा को, और मेरे वे मित्र जो हिंदी में १ से सौ तक भी नहीं गिन सकते, वो ये सीख लें, भारत कि आत्मा समझ आनी प्रारंभ हो जायेगी.

अंत में एक शेर के साथ इसका समापन करता हूँ.

"चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वरना ज़माने-भर को समझाने हम कहाँ जाते
क़तील अपना मुकद्दर ग़म से बेगाना अगर होता
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते "

जय हिंद, जय भारत 

Kalam waapis aa gayi hai


"शब्दों से सुनो, बंदूक की ध्वनि निकलती है, कलम स्याही नहीं, बारूद के अक्षर उगलती है !" कलम तब हाथ में हुआ करती थी, जो अब फेसबुक से आग उगलती है. श्री अन्ना हजारे का मिशन यहीं तो शुरू हुआ था जो राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बन गया है. कहा जाता है कोई भी क्रांति तब तक सफल नहीं होती जब तक उसे जनता का समर्थन हासिल न हो. भारत वर्ष की विडम्बना यही है, इतनी बड़ी जनसँख्या के बावजूद भी कोई भी क्रांति आज तक पूरी तरह से सफल नहीं हुई.1857 की क्रांति को ही ले लीजिये, क्रांति के नायकों को भारत वर्ष के सिपाहियों और कुछ गद्दार राजाओं ने समाप्त किया. क्रांति असफल हुई. बापू का असहयोग आन्दोलन जो एक बड़ी क्रांति के रूप में परिवर्तित हो गया था, चौरी चौरा में हुई एक छोटी सी भूल के कारण असफल हुआ.1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन तो था ही कमाल का, 30 करोड़ के ऊपर जनसँख्या के बावजूद भी कुछ लाख लोग इसे चलाते रहे. वह तो भला हो द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश को मिली हार का, जो उन्हें अपनी खुद की समस्याओं के कारण भारत को छोडना पड़ा, वरना आजादी तो बहुत दूर थी. अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले नेताजी सुभाष चंदर बोस ने कहा था की मुफ्त में मिली आजादी देश वासियों को हजम नहीं होगी और वे भ्रष्ट बन जायेंगे. नेहरु जी जैसे कमरों में बंद नेता प्रधानमन्त्री बना दिए गए, और पटेल जैसे नेता पीछे छोड़ दिए गए. ये विडम्बना ही तो है कि नेहरु के परिवार में इस पीढ़ी को छोड़ कर सब पीढ़ियों को भारत रत्न से नवाजा गया और भारत वर्ष को अखंड बनाने वाले पटेल को गुजरात के बाहर कोई पूछता नहीं. नेहरु जी ने पटेल जी से एक ही जनपद माँगा था अपनी मर्जी से भारत में मिलाने के लिए, वह था कश्मीर, देखिये इसका क्या हाल है. हमारा इतिहास एतिहासिक भूलों से भरा हुआ है, जब दुनिया पूंजीवाद की और भाग रही थी नेहरु जी हमें समाजवाद की और ले गए जो रूस चला रहा था, चीन को अपना भाई घोषित किया. देखिये क्या नतीजा निकला, रूस का समाज वाद कबका असफल हो चुका, दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अब ११ मुल्कों में बाँट गयी है और चीन नें 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया. इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे छोटे मुल्क तरक्की में हमसे कहीं आगे चले गए और भारत अपने आप को पूंजी वाद से तरक्की के राह पर ले जा रहा है, 1948 के कश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण पर जब भारत कि सेनायें कश्मीर से पकिस्तान को खदेड़ ही रही थी कि नेहरु जी को फिर सूझी कि संयुक्त राष्ट्र के पास चला जाये और संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध विराम करवा दिया, नतीजा आधा कश्मीर पकिस्तान के पास चला गया. फिर आई एक और एतिहासिक भूल, तिब्बत को चीन का भाग घोषित करने वाला पहला मुल्क भारत था, अब चीन भारत में से अरुणाचल प्रदेश चाहता है और लद्दाख पर आँखें टेढ़ी करता है. ये तो हुआ नेहरु जी का कार्यकाल. आगे चलते हैं इंदिरा जी के कार्यकाल की और, जो लौह महिला कहलाती हैं. उनके कार्यकाल में व्यापक भ्रष्टाचार को देख कर भारत में एक व्यापक जन आन्दोलन चला श्री जय प्रकाश नारायण के नेत्रित्व में. देश की इस क्रांति को सम्पूर्ण क्रांति के नाम से जाना जाता है. देश बदल ही रहा था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा जी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया, खिसियाई हुई इंदिरा जी ने आपात काल की घोषणा कर दी. कोई पूछे की आपातकाल की परिस्थितियाँ कहाँ आई? नेहरु जी भारत रत्न, इंदिरा जी भारत रत्न. फिर उनका बेटा भारत रत्न. अगली भारत रत्न होंगी त्याग की मूर्ति सोनिया मैडम, फिर उनका बेटा राहुल, फिर आगे का पता नहीं, राहुल ने शादी की नहीं, शायद प्रियंका का बेटा बने भारत रत्न. 

इन एतिहासिक भूलों को आखिर भारत कब तक बर्दाश्त करेगा. 

ये कलम अब रुकेगी नहीं, ये कलम अब झुकेगी नहीं. श्री अन्ना हजारे ने एक एतिहासिक भूल को आज समाप्त कर दिया, उस महान आत्मा को शत शत नमन. श्री राम धारी सिंह दिनकर की कविता से ये नोट समाप्त करता हूँ:

"जला अस्थियां बारी-बारी

चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल।
कलम, आज उनकी जय बोल


जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल


पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल


अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल"

Friday, February 4, 2011

Pre Launch

The law firm name has been finalised as Lex Mondial, it will have initially two offices. We are planning to expend it further as the work progresses. We have opened up the offices in New Delhi and Chandigarh. 

Monday, December 13, 2010

Name change!!

Why I changed the title of my blog. This blog describes me and my journey. Being rebel is not that easy. Having ideals other than the ideals of the society, which are well established and followed by the generations, shall always give problem to one or other person. But, I am what I am. Thats why I have describe myself as a rebel. I refuse to follow what other term as proper. My life has never been easy in any term. From Jind to Chandigarh and journey from High Court to corporate and then back. Everything is just filled up with hurdles. But I refuse to quit. Its a road less taken. 2011 should change the view of society regarding me and my journey. So, the title is changed this time.