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Tuesday, February 7, 2012

राजनीति किस दिशा में लेकर जा रही है भारत को

राजनीति किस दिशा में लेकर जा रही है भारत को यह समझना आज के हालात में बेहद मुश्किल है. ऐसे समय में जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध पूरे भारत में आन्दोलन चल रहे हैं, कांग्रेस की साख बुरी तरह गिरी है, यह सोचना विचारणीय हो जाता है कि उसके बाद भी विपक्षी दलों के मत प्रतिशत में कोई लंबा चौड़ा बदलाव नहीं दिख रहा है. बुरी तरह अंदरूनी कलह से परेशान भाजपा तो किसी भी जगह पर अपने लिए एक सर्वमान्य नेता तक नहीं तैयार कर पा रही है. जहाँ सभी सर्वेक्षण नरेंद्र भाई मोदी को भाजपा की और से सर्वदा पसंदीदा उम्मीदवार दिखा रहे हैं वहीँ भाजपा किसी भी राज्य में उन्हें लेकर जाने की भी हिम्मत नहीं कर रही है. भले ही इस समय पर यह कहना अनुचित होगा कि कौन अगला प्रधानमन्त्री होगा, पर फिर भी एक भी पार्टी यह दावा नहीं ठोक सकती कांग्रेस के अलावा कि उनका आने वाला प्रधानमन्त्री पद का दावेदार कौन होगा. जहाँ तक कांग्रेस की बात है वहां गाँधी परिवार का एक छत्र राज है. जोकि आज से नहीं अपितु पिछले साठ वर्षों से अधिक समय से है. उसके पास राहुल गाँधी के रूप में सहज उम्मीदवार है; हालांकि समूचे गाँधी परिवार में सबसे कम लोक प्रिय और सबसे कम करिश्माई नेता की उनकी छवि को तोड़ने का पार्टी भरसक प्रयास कर रही है पर वे चूँकि कहीं भी अपेक्षित सफलता अर्जित नहीं कर पा रहे हैं इसलिए उनके करिश्मे पर प्रश्न चिह्न लगना तो अवश्यम्भावी है. विपक्ष की मुसीबत उन सरकारों ने बढ़ा रखी हैं जहाँ गैर कांग्रेस सरकारें हैं. लगभग सभी ऐसे राज्यों में अगले लोकसभा चुनावों से पहले चुनाव हैं और वहां सरकार विरोधी लहर से कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर फायदा स्पष्ट रूप से होगा. जहाँ समूची कांग्रेस राहुल गाँधी के लिए लगभग एक मत है, कोई भी अन्य पार्टी किसी भी एक उम्मीदवार को लेकर एक मत नहीं बना रही है. वोटरों की चुप्पी सबका खेल अलग से बिगाड़ रही है. जहाँ अधिक मतों का प्रतिशत पहले सरकार विरोध का परिचायक माना जाता था वहीँ बिहार के चुनावों ने इस मिथक की धज्जियां उड़ा दी. राजनैतिक पार्टियाँ अपनी पूरी बुद्धि का इस्तेमाल करके भी पूरी तरह सही स्थिति नहीं बना पा रही हैं. सही मायने में इस समय यदि कोई विपक्ष है वह है माननीय न्यायालय. अपने अनेकों एतिहासिक निर्णयों के साथ पिछले दो वर्ष न्यायिक सक्रियता के लिए ऐसे ही जाने जायेंगे जैसे इमरजेंसी के समय के वर्ष जाने जाते हैं. पर न्यायालय का सरकार के ऊपर हावी होना हमारे राजनैतिक तंत्र की कमजोरी का परिचायक है क्योंकि कोई भी नीतिगत निर्णय न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना पूरा नहीं हो पा रहा है. ऐसे में जनता नेताओं के बारे में बुरा न सोचे तो क्या करे. परिवर्तन और साफ़ सुथरी सरकार के नाम पर वोट मांगती भाजपा जहाँ उत्तर प्रदेश में अपने अभियान का प्रारंभ बाबु लाल कुशवाहा से करती है वहीँ अकालियों के तथाकथित गुंडाराज के विरोध में वोट मांगती कांग्रेस पंजाब में कत्ले आम की बात करती है. एक बेहद कठिन परिस्थिति से गुजर रही भारत की राष्ट्रीय राजनीति को कोई करिश्माई नेतृत्व की पुरजोर तरकार है!

Tuesday, June 14, 2011

मेरी जाति "आम आदमी" है.

मेरी जाति "आम आदमी" है.

सड़क पर फटे हाल एक पुरुष को खड़ा देख,नेता जी रुके,
उनसे पूछा,
तुम कौन हो भाई,
बड़े गरीब और पिछड़े हुए लगते हो,
कितने पढ़े लिखे हो, क्या करते हो,
परिवार में कौन कौन है, क्या क्या करता है,

तुम गरीबी रेखा से नीचे हो?
अगर हो तो तुम्हें चावल मिलेगा, तेल मिलेगा घर मिलेगा,
तुम पिछड़ी जाति के हो, अगर हो तो तुम्हें छात्रवृति मिलेगी,
नौकरी मिलेगी, प्रोत्साहन मिलेगा,

तुम अनुसूचित जाति के हो?
अगर हो तो तुम्हें सरकार नौकरी देगी, बच्चों को पढ़ाएगी,
सब कुछ तुम्हें मुफ्त मिलेगा, तुम बोलो भाई तुम कौन हो?

तुम महिला होते तो तुम्हें अलग से खड़े होने का मौका मिलता,
आरक्षण मिलता, सब कुछ मिलता, पर तुम कुछ बोलते नहीं, कुछ बोलो!

इतनी देर से परेशान वो पुरुष बोला,
नेता जी,
बड़ा दुःख है मुझे कि मैं इनमें से कुछ नहीं,
पर आप समझ पायेंगे ही नहीं मैं क्या हूँ,
भारत की सभी सरकारें मेरे नाम से मत लेती हैं,
मेरा नाम हर घोषणा पत्र में होता है, मेरे नाम से सब आगे बढ़ते हैं,
आपने भी कभी न कभी मेरी जाति का नाम जरूर सुना होगा,
पर दुःख है कि यहाँ मुझे पूछने वाला कोई नहीं,
मैं भूखा हूँ, अनाज नहीं मिलता,
मेरे बच्चे पढना चाहते हैं पर उन्हें दाखिला नहीं मिलता,
मैं पढ़ा लिखा हूँ, मुझे काम नहीं मिलता,
रहने को छत नहीं, पर मुझे घर नहीं मिलता.

नेता जी हैरान परेशान देखते रहे,
वो पुरुष बोलता रहा,

नेता जी मेरी जाति"आम आदमी"  है,
इस देश में सबको सब कुछ मिलता है,
पर मुझे कोई नहीं पूछता,
हर चुनाव में मैं मत का प्रयोग करता हूँ,
मेरे मत से सरकार बदलती है,
पर मैं पचास साल पहले भी भूखा था,
आज भी हूँ.

मैं आम आदमी हूँ, 
क्या आप मेरी सहायता करेंगे?

नेता जी अनमना सा मूंह लेकर अपनी गाडी में चले गए,
और आम आदमी अगले नेता जी कि गाडी का इंतज़ार करने लगा.

-----रविन्द्र सिंह ढुल, १४-०६-२०११, जींद  


Friday, April 22, 2011

लोकतंत्र.

भारत एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र है, लोकतंत्र में एक गंभीर खामी होती है कि सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी को निर्वाचित घोषित किया जाता है, मतदाता एक चुने हुए प्रत्याशी को भेजते हैं उनके हितों की रक्षा के लिए. समस्या गंभीर इसलिए हो जाती है क्योंकि बहुत से मत उस प्रत्याशी के विरुद्ध भी होते हैं और प्रत्याशियों को भी और मतदाताओं को भी इस बात का पता रहता है. अतः ये कहा जा सकता है कि वह प्रत्याशी कुछ गिने चुने ३०-३५ प्रतिशत मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है, न कि एक पूरे क्षेत्र का. भारत जैसे विकासशील देशों में समस्या यहीं से उत्पन्न होती है. जनता को पूरा प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, रही सही कसर तब पूरी हो जाती है जब विपक्ष में जिन्होंने अपने मत का प्रयोग किया है उनके कार्य नहीं होते. यहाँ पैदा होता है लोकतंत्र में गतिरोध, जो गैर सामाजिक संगठनों को बढ़ावा देता है और भ्रष्ट विचारों की नींव रखता है. जो विधायक, सांसद या पार्षद विपक्ष में होते हैं उनके जायज कामों को भी रोका जाता है. क्या इसे जायज लोकतंत्र कहा जायेगा किसी भी हाल में? सरकार का काम जनता का विकास करना है, न की अपने कुछ कार्यकर्ताओं का विकास करना. भले ही दल कोई भी रहा हो, पर विकास हमेशा कार्यक्रताओं का ही होता आया है. क्या यह परिदृश्य बदला जा सकता है? यदि नहीं तो यह मान लेना श्रेयस्कर होगा कि हम अभी एक अविकसित लोकतंत्र में जी रहे हैं क्योंकि लोकतंत्र का सीधे सीधे मतलब यह हुआ कि लोगों के द्वारा चलाया जा रहा तंत्र. यदि पक्ष के साथ विपक्ष को प्रतिनिधित्व न मिले तो यह कम से कम आधी जनता का तो अपमान है ही. कृप्या सोचें.

Sunday, April 10, 2011

A Journey just began

 नमस्कार आप सब को प्रणाम, 

आज एक अजीब विडम्बना से गुजर रहा हूँ. भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रहे राष्ट्रव्यापी अभियान की परिणति क्या होगी, ये समझने का गंभीर प्रयास सुबह से मेरे दिलोदिमाग में चल रहा है. अब जब कलम चल ही निकली है तो इसके परिणाम निकलना भी लाजमी है, निकलने भी चाहिए इसमें कुछ गलत भी क्या है. पर गंभीर समस्या ये है की अपनी भाषा में सोचना भी आज कल पाप हो चला है. मैंने तो अपने सम्पूर्ण जीवन को एक उद्देश्य की और लगा दिया है पर साथी मिलेंगे क्या? जबसे वकालत की थी मेरा दिमाग भी अंग्रेजी हो चला था. सोचकर भी न सोच पाया कि क्यूँ हम विदेशी भाषा को इतनी तवज्जो देते हैं. अगर मैं अंग्रेजी में लिखूं, इसमें पढू और इसे बोलूं तो मुझे समझदार समझा जाता है. विश्व की सबसे विलक्षण भाषा संस्कृत और उससे निकली हिंदी आदि भाषाओँ में लिखना तो जैसे पाप है. क्या ये दिमागी भ्रष्टाचार नहीं है. क्या हम खुद को धोखा नहीं दे रहे. आखिर क्यूँ अंग्रेजी लिखने और बोलने से ही इस देश में समझदार पैदा होते हैं. आखिर क्यूँ? 

लगता तो यही है की हम अपनी भाषा और अपनी संस्कृति के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं. नहीं तो हमारा नाम भारत होता विश्व मानचित्र मैं न की इंडिया. जब तक ये मानसिक भ्रष्टाचार और गुलामी नहीं निकलेगी मुझे नहीं लगता कि भारत एक हो जाएगा. भ्रष्टाचार के विरुद्ध सारा देश एक हो गया है मुझे तो इसमें भी शक है. ये भारत १९४२ में एक नहीं हुआ था, २०११ में क्या होगा. लोगों ने ब्रिटिश शाषन के अंत कि आलोचना की थी, श्री अन्ना हजारे के कदम को क्या गंभीरता से लेंगे. फेसबुक नें इसमें बड़ा योगदान दिया, लीबिया, मिस्र, सीरिया आदि के बाद भारत में इसका पूरा प्रयोग हुआ. पर क्या लोग रिश्वत देना बंद कर देंगे? इस आन्दोलन में किसी को स्वामी अग्निवेश से दिक्कत थी, कोई श्री अन्ना हजारे को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का एजेंट बताने में तुला था, एक भाई तो किरण बेदी जी को ही गाली देने में तुला था की अन्ना जी भूखे हैं और किरण जी बेशर्मी से जल का पान कर रही हैं. क्या ऐसे हम भारत को जगायेंगे. स्वामी रामदेव के मंच पर आते ही तो जैसे कांग्रेस के लोगों के पेट में उबाल आ गया, कोई उन्हें ढोंगी तो कोई अन्य गाली से संबोधित कर रहा था. क्या ऐसे बदलेगा भारत. 

गाँधी टोपी पहन कर जंतर मंतर पे खड़े हो कर फोटो खिंचवाने वाले लोग भारत को बदलेंगे? जो देश गाँधी को न समझ पाया वो १०० घंटे में बदल जाएगा, मुझे इसमें संदेह है. मेरे एक प्रिय मित्र हैं, जो अक्सर मुझसे झगड़ते हैं की अहिंसा से कुछ नहीं हो सकता, एक बात तो तय है की उनकी जुबान पर ताला लग गया इसके साथ ही. पर परिस्थितियाँ अभी बहुत मुश्किल हैं और लड़ाई बाकी है. ये अन्ना जी ने खुद भी कहा कि ये शुरुआत भर है. भारत को बदलाव कि जरूरत है, ये निश्चित है पर ये फैशन नहीं बदलाव होना चाहिए. तभी ये लड़ाई सार्थक होगी. अपने अन्दर भारतीय को खोजें जो कहीं अमेरिका में जाकर गम हो गया है, ये देश खुद ब खुद बदल जाएगा. सम्मान दीजिये अपनी सोच को, अपनी भाषा को, अपनी वेशभूषा को, और मेरे वे मित्र जो हिंदी में १ से सौ तक भी नहीं गिन सकते, वो ये सीख लें, भारत कि आत्मा समझ आनी प्रारंभ हो जायेगी.

अंत में एक शेर के साथ इसका समापन करता हूँ.

"चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी
वरना ज़माने-भर को समझाने हम कहाँ जाते
क़तील अपना मुकद्दर ग़म से बेगाना अगर होता
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते "

जय हिंद, जय भारत 

Kalam waapis aa gayi hai


"शब्दों से सुनो, बंदूक की ध्वनि निकलती है, कलम स्याही नहीं, बारूद के अक्षर उगलती है !" कलम तब हाथ में हुआ करती थी, जो अब फेसबुक से आग उगलती है. श्री अन्ना हजारे का मिशन यहीं तो शुरू हुआ था जो राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बन गया है. कहा जाता है कोई भी क्रांति तब तक सफल नहीं होती जब तक उसे जनता का समर्थन हासिल न हो. भारत वर्ष की विडम्बना यही है, इतनी बड़ी जनसँख्या के बावजूद भी कोई भी क्रांति आज तक पूरी तरह से सफल नहीं हुई.1857 की क्रांति को ही ले लीजिये, क्रांति के नायकों को भारत वर्ष के सिपाहियों और कुछ गद्दार राजाओं ने समाप्त किया. क्रांति असफल हुई. बापू का असहयोग आन्दोलन जो एक बड़ी क्रांति के रूप में परिवर्तित हो गया था, चौरी चौरा में हुई एक छोटी सी भूल के कारण असफल हुआ.1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन तो था ही कमाल का, 30 करोड़ के ऊपर जनसँख्या के बावजूद भी कुछ लाख लोग इसे चलाते रहे. वह तो भला हो द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश को मिली हार का, जो उन्हें अपनी खुद की समस्याओं के कारण भारत को छोडना पड़ा, वरना आजादी तो बहुत दूर थी. अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले नेताजी सुभाष चंदर बोस ने कहा था की मुफ्त में मिली आजादी देश वासियों को हजम नहीं होगी और वे भ्रष्ट बन जायेंगे. नेहरु जी जैसे कमरों में बंद नेता प्रधानमन्त्री बना दिए गए, और पटेल जैसे नेता पीछे छोड़ दिए गए. ये विडम्बना ही तो है कि नेहरु के परिवार में इस पीढ़ी को छोड़ कर सब पीढ़ियों को भारत रत्न से नवाजा गया और भारत वर्ष को अखंड बनाने वाले पटेल को गुजरात के बाहर कोई पूछता नहीं. नेहरु जी ने पटेल जी से एक ही जनपद माँगा था अपनी मर्जी से भारत में मिलाने के लिए, वह था कश्मीर, देखिये इसका क्या हाल है. हमारा इतिहास एतिहासिक भूलों से भरा हुआ है, जब दुनिया पूंजीवाद की और भाग रही थी नेहरु जी हमें समाजवाद की और ले गए जो रूस चला रहा था, चीन को अपना भाई घोषित किया. देखिये क्या नतीजा निकला, रूस का समाज वाद कबका असफल हो चुका, दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अब ११ मुल्कों में बाँट गयी है और चीन नें 1962 में भारत पर आक्रमण कर दिया. इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे छोटे मुल्क तरक्की में हमसे कहीं आगे चले गए और भारत अपने आप को पूंजी वाद से तरक्की के राह पर ले जा रहा है, 1948 के कश्मीर पर पाकिस्तान के आक्रमण पर जब भारत कि सेनायें कश्मीर से पकिस्तान को खदेड़ ही रही थी कि नेहरु जी को फिर सूझी कि संयुक्त राष्ट्र के पास चला जाये और संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध विराम करवा दिया, नतीजा आधा कश्मीर पकिस्तान के पास चला गया. फिर आई एक और एतिहासिक भूल, तिब्बत को चीन का भाग घोषित करने वाला पहला मुल्क भारत था, अब चीन भारत में से अरुणाचल प्रदेश चाहता है और लद्दाख पर आँखें टेढ़ी करता है. ये तो हुआ नेहरु जी का कार्यकाल. आगे चलते हैं इंदिरा जी के कार्यकाल की और, जो लौह महिला कहलाती हैं. उनके कार्यकाल में व्यापक भ्रष्टाचार को देख कर भारत में एक व्यापक जन आन्दोलन चला श्री जय प्रकाश नारायण के नेत्रित्व में. देश की इस क्रांति को सम्पूर्ण क्रांति के नाम से जाना जाता है. देश बदल ही रहा था कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा जी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया, खिसियाई हुई इंदिरा जी ने आपात काल की घोषणा कर दी. कोई पूछे की आपातकाल की परिस्थितियाँ कहाँ आई? नेहरु जी भारत रत्न, इंदिरा जी भारत रत्न. फिर उनका बेटा भारत रत्न. अगली भारत रत्न होंगी त्याग की मूर्ति सोनिया मैडम, फिर उनका बेटा राहुल, फिर आगे का पता नहीं, राहुल ने शादी की नहीं, शायद प्रियंका का बेटा बने भारत रत्न. 

इन एतिहासिक भूलों को आखिर भारत कब तक बर्दाश्त करेगा. 

ये कलम अब रुकेगी नहीं, ये कलम अब झुकेगी नहीं. श्री अन्ना हजारे ने एक एतिहासिक भूल को आज समाप्त कर दिया, उस महान आत्मा को शत शत नमन. श्री राम धारी सिंह दिनकर की कविता से ये नोट समाप्त करता हूँ:

"जला अस्थियां बारी-बारी

चिटकाई जिनमें चिंगारी,
जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर
लिए बिना गर्दन का मोल।
कलम, आज उनकी जय बोल


जो अगणित लघु दीप हमारे
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल।
कलम, आज उनकी जय बोल


पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही सौ लपट दिशाएं,
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल।
कलम, आज उनकी जय बोल


अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा,
साखी हैं उनकी महिमा के
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल।
कलम, आज उनकी जय बोल"