Showing posts with label India. Show all posts
Showing posts with label India. Show all posts

Thursday, October 27, 2011

ढीली करो धनुष की डोरी – रामधारी सिंह "दिनकर"


राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह महान रचना सोचने पर मजबूर करती है. यह रचना आजादी के सात वर्ष के बाद लिखी गयी थी. इसमें श्री दिनकर की व्यथा स्पष्ट है. इसे उन्होंने उस समय व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर लिखा था. इसे पढ़ें एवं सोचें...जय हिंद.

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो ,
 किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।

फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले !
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।

वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है
माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज
सात(साठ) वर्ष हो गये राह में, अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में

समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा

समर शेष है, उस स्वराज को सत्य बनाना होगा
जिसका है ये न्यास उसे सत्वर पहुँचाना होगा
धारा के मग में अनेक जो पर्वत खडे हुए हैं
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अडे हुए हैं

कह दो उनसे झुके अगर तो जग मे यश पाएंगे
अड़े रहे अगर तो ऐरावत पत्तों से बह जाऐंगे

समर शेष है, जनगंगा को खुल कर लहराने दो
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो
पथरीली ऊँची जमीन है? तो उसको तोडेंगे
समतल पीटे बिना समर कि भूमि नहीं छोड़ेंगे

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर

समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं
गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल

तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना
बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध   – रामधारी सिंह "दिनकर"

Wednesday, June 15, 2011

मेरे भारत का मशहूर तमाशा.

मेरे भारत का मशहूर तमाशा.

मेरे भारत में कुछ ख़ास है,
प्याज से सरकार बदलती है, दंगों से सरकार बनती है,
नौकरी का फैंसला पैदा होने पर होता है,
लिंग का फैंसला पैदा होने से पहले होता है,
गरीब की तकदीर में तो बहुत कुछ ख़ास है,
पहले हाथ जुड्वाता है बाद में हाथ जोड़ता है.
मेरे भारत में कुछ ख़ास है.

जनता यहाँ गाली देती है पर कुछ बदलती नहीं,
एक धर्म को गाली देना यहाँ धर्मनिरपेक्षता है,
अंग्रेजी बोलने को लोग बड़ा मानते हैं,
पर १२ कोस पर यहाँ बोली बदलती है,
हर प्रदेश की अपनी वेश भूषा है,
किस्मत फिर भी पेंट-कोट से बदला करती है.

मेरे भारत में कुछ ख़ास है,
यहाँ तकदीरें पुरुषार्थ से नहीं जुगाड़ों से बदला करती है.

---रविन्द्र सिंह ढुल, जींद, दिनांक: १५-०६-२०११ 

Tuesday, June 14, 2011

मेरी जाति "आम आदमी" है.

मेरी जाति "आम आदमी" है.

सड़क पर फटे हाल एक पुरुष को खड़ा देख,नेता जी रुके,
उनसे पूछा,
तुम कौन हो भाई,
बड़े गरीब और पिछड़े हुए लगते हो,
कितने पढ़े लिखे हो, क्या करते हो,
परिवार में कौन कौन है, क्या क्या करता है,

तुम गरीबी रेखा से नीचे हो?
अगर हो तो तुम्हें चावल मिलेगा, तेल मिलेगा घर मिलेगा,
तुम पिछड़ी जाति के हो, अगर हो तो तुम्हें छात्रवृति मिलेगी,
नौकरी मिलेगी, प्रोत्साहन मिलेगा,

तुम अनुसूचित जाति के हो?
अगर हो तो तुम्हें सरकार नौकरी देगी, बच्चों को पढ़ाएगी,
सब कुछ तुम्हें मुफ्त मिलेगा, तुम बोलो भाई तुम कौन हो?

तुम महिला होते तो तुम्हें अलग से खड़े होने का मौका मिलता,
आरक्षण मिलता, सब कुछ मिलता, पर तुम कुछ बोलते नहीं, कुछ बोलो!

इतनी देर से परेशान वो पुरुष बोला,
नेता जी,
बड़ा दुःख है मुझे कि मैं इनमें से कुछ नहीं,
पर आप समझ पायेंगे ही नहीं मैं क्या हूँ,
भारत की सभी सरकारें मेरे नाम से मत लेती हैं,
मेरा नाम हर घोषणा पत्र में होता है, मेरे नाम से सब आगे बढ़ते हैं,
आपने भी कभी न कभी मेरी जाति का नाम जरूर सुना होगा,
पर दुःख है कि यहाँ मुझे पूछने वाला कोई नहीं,
मैं भूखा हूँ, अनाज नहीं मिलता,
मेरे बच्चे पढना चाहते हैं पर उन्हें दाखिला नहीं मिलता,
मैं पढ़ा लिखा हूँ, मुझे काम नहीं मिलता,
रहने को छत नहीं, पर मुझे घर नहीं मिलता.

नेता जी हैरान परेशान देखते रहे,
वो पुरुष बोलता रहा,

नेता जी मेरी जाति"आम आदमी"  है,
इस देश में सबको सब कुछ मिलता है,
पर मुझे कोई नहीं पूछता,
हर चुनाव में मैं मत का प्रयोग करता हूँ,
मेरे मत से सरकार बदलती है,
पर मैं पचास साल पहले भी भूखा था,
आज भी हूँ.

मैं आम आदमी हूँ, 
क्या आप मेरी सहायता करेंगे?

नेता जी अनमना सा मूंह लेकर अपनी गाडी में चले गए,
और आम आदमी अगले नेता जी कि गाडी का इंतज़ार करने लगा.

-----रविन्द्र सिंह ढुल, १४-०६-२०११, जींद  


Sunday, June 12, 2011

एक आम आदमी का गुनाह!!

एक आम आदमी का गुनाह!!

सड़क पर चलते एक आम आदमी को पुलिस ने पकड़ लिया. यह छोटी सी कविता उस आम आदमी और पुलिस की वार्ता का दृष्टान्त है. इसकी रचना मैंने खुद की है. 

सड़क पर चलते उस आदमी को पुलिस ने पकड़ लिया,
उन्हें हवालात में बिठाया गया,
तुम क्यों आये पूछा बराबर वाले कैदी ने,
जवाब मिला पता नहीं. 

उन्होंने दूसरे कैदी से पूछा,
तुम क्यों आये भाई हवालात में,
शकल से तो तुम भी शरीफ लगते हो?
ऐसा क्या किया जो यहाँ बैठे हो.

मैं तो बिजली का बिल समय पर भरता हूँ,
राशन के लिए पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा होता हूँ,
बस में जाते हुए खड़ा होकर सफ़र करता हूँ,
नौकरी करते २० साल हुए पर मेरे अफसर को मेरा नाम नहीं पता,
भ्रष्टाचार मैं करता नहीं, किसी अबला का अपमान मैं करता नहीं,
तुम बताओ भाई तुम्हें क्या हुआ?

भाई मेरी भी यही गाथा है,
पर मेरी गाथा में अलग ये है की मेरे पास नौकरी नहीं है,
अपने माता पिता की सेवा करता हूँ,
नौकरी के लिए पंक्तियों में लगता हूँ,
मैं तो नौकरी के लिए किसी नेता के पास नहीं जाता,
कभी किसी को पैसा नहीं खिलाता,
तो फिर मैं यहाँ क्यों?

पास में खड़ा पुलिस अफसर जो ये सब सुन रहा था,
बोला-
भाई सड़क पे तो तुम दोनों सही थे,
महंगाई की मार से तुम दोनों त्रस्त हो,
कभी पुलिस स्टेशन देखा नहीं,
कभी बेईमानी की नहीं,
पर फिर भी मुझे तुम्हें पकड़ना पड़ा,
क्योंकि तुम एक आम आदमी हो,
और आम आदमी होना भारत में गुनाह है.

दोनों व्यक्ति दंग , एक दूसरे को देखते रह गए,
पुलिस वाला बोला,
भाई अगर तुम वो सब करलेते,
तो तुम यहाँ शासन करते और......
और.....
कोई और आम आदमी अन्दर होता,
तुम नहीं.....!!!

-रविन्द्र सिंह, दिनांक १२-०६-२०११, जींद 

Monday, June 6, 2011

क्रांति की आवश्यकता

क्या हम क्रांति की और बढ़ रहे हैं? ये प्रश्न आज सभी भारतियों के मन में कौंध रहा होगा शायद. सभी के बारे में तो कहना मुश्किल है पर मैं अवश्य यह सोच कर परेशान हूँ कि क्या भारत क्रांति की और बढ़ रहा है? पिछले दो वर्ष के घटना क्रम के बारे में जरा सोचिये. २००९ में जब कांग्रेस ने केंद्र में दोबारा सरकार बनाई थी तो उनके पास किसानो के कर्ज माफ़ करना, सुचना का अधिकार, नरेगा और कई ऐसी उपलब्धियां थी कि प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के साथ सारी कांग्रेस आत्मविश्वास से लबरेज थी. २०११ आते आते भारत कि राजनीति और उसके सभी मायने बदल गए हैं. गली चौपालों में केंद्र की सरकारों के बारे में शायद ही कभी कोई जिक्र होता था, इसका महत्वपूर्ण कारण ये है कि आम जनमानस को अधिकतर राज्य सरकारों से अधिक सरोकार होता है. कांग्रेस इसी कारण भारत में अधिक समय तक राज कर पायी है. भारत के स्वतंत्र होने पर देश में विपक्ष था ही नहीं इसलिए १९४७ से १९६७ तक नेहरु जी ने राज किया. उनकी मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी ने राज किया जो सार्वजनिक जीवन में सादगी और इमानदारी की मिसाल थे. यहाँ तक भ्रष्टाचार था तो सही पर आम जनता को उस से कम ही फर्क पड़ता था क्योंकि छोटी मोती दलाली करके नेता और बिचोलिये कमा लेते थे. सार्वजनिक जीवन में सच्चाई की कीमत थी क्योंकि गाँधी जी के आदर्श अभी जीवित थे, लोगों के कार्य अधिकतर सार्वजनिक हुआ करते थे क्योंकि अधिक भारतीय ग्रामों में रहते थे, ग्रामीण जीवन में सांझे कार्यों की कीमत थी और नेता कुछ सार्वजनिक कार्य करके अपनी राजनीति को आगे बढ़ाते थे. बाद में आई श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार, इंदिरा जी जो की भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री की पुत्री थी, उनमें लोगों को क्रांति की परछाई दिखती थी. उनके समय तक भ्रष्टाचार भारत के सार्वजनिक जीवन में अपने पैर पसार चूका था. श्री जय प्रकाश नारायण की क्रांति बिहार से शुरू होकर भारत में फ़ैल रही थी. तभी आया १९७५ जब भ्रष्ट तरीकों का प्रयोग करके चुनाव जीतने पर इंदिरा जी के चुनाव को इलाहबाद उच्च न्यायलय ने रद्द कर दिया ( राज नारायण बनाम इंदिरा गाँधी ). अब आया भ्रष्टाचार का युग भारत में, अपने चुनाव के रद्द होने से इंदिरा जी इतनी व्यथित हो गयी की उन्होंने भारत में आपातकाल की घोषणा कर दी. इसे समस्त भारत जानता है की आपातकाल की उस समय भारत को कितनी जरुरत थी. भारत पिछड़ गया और सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया पर तब तक श्री जय प्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति बहुत फ़ैल चुकी थी और आने वाले चुनावों में सबसे पहले सत्ता परिवर्तन हुआ और सत्ता कांग्रेस के हाथ से निकल कर जनता दल के हाथ में जा पंहुची. जनता दल की लहर ने भारत के राजनितिक परिद्रश्य को बदल कर रख दिया और विभिन्न प्रदेशों में कई महत्वपूर्ण गैर कांग्रेस नेता पैदा हुए जैसे बिहार में लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, नितीश कुमार आदि, हरियाणा में चौधरी देवी लाल, उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह आदि. भारत की सत्ता पहली बार ३५ वर्षों में कांग्रेस के हाथ से निकली. यहाँ राजनीति में कई गंभीर अपराध हुए, पंजाब में अकाली दल के वर्चस्व को कम करने के लिए इंदिरा ने जरनैल सिंह भिंडरावाला को शह दी और उसने अपने पंख पसारते हुए पंजाब को गंभीर आतंकवाद में घेर दिया. हजारों जानें जाने के बाद राजनीति के एक गंभीर फैंसले को लेते हुए इंदिरा ने ऑपरेशन ब्लू स्टार में भिंडरावाला को श्री हरमंदिर साहिब में फ़ौज को घुसा कर मार दिया. उसे शहीद का दर्जा देते हुए इंदिरा जी के गन मैन ने उनकी हत्या कर दी. फिर आया राजनीति का एक गंभीर अपराध और सिखों के विरुद्ध दंगों में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली और हरियाणा में हजारों मासूमों की जान ले ली. भारत की आजादी के बाद भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लड़ी, उनकी लड़ाई का प्रमुख केंद्र बोफोर्स घोटाला था जिसमे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पर आरोप लगे और भारत में सत्ता बदल गई. पर एक और राजनितिक रूप से गलत निर्णय ने इंदिरा जी के बाद उनके पुत्र की भी जान लेली. फिर हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस और मुंबई दंगों जैसे बुरे घटनाक्रम जोकि काले अध्याय हैं. १९९६ से १९९९ का काल भारत का सबसे अस्थिर राजनितिक काल रहा और आया राम गया राम राजनीति में भारत ने ३ प्रधानमन्त्री देखे. १९९९ से २००४ का कार्यकाल भारतीय जनता पार्टी के नाम रहा जो श्री अटल बिहारी वाजपाई के नेत्रित्व में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ी पर प्याज के आंसू रोती हुई इस सरकार ने २००४ में इंडिया शाइनिंग के नारे के बीच घुटने टेक दिए क्योंकि इस बीच गोधरा के नरसंहार के विरोधस्वरूप हुए दंगों ने हजारों की जान लेली और उसका सीधा फल केंद्र में भाजपा को भोगना पड़ा, पर वोट के नुक्सान में नहीं पर कुछ पार्टियों के पीछे हटने से जो धर्मनिरपेक्ष होने का दंभ भरती हैं. यहाँ धरमनिर्पेक्षता की परिभाषा कोई नहीं जानता, धरमनिर्पेक्षता जोकि भारत के संविधान के मूल में है ( केशवनंदा भारती बनाम केरल ) इसका मतलब सभी धर्मों के प्रति सौहार्द है न कि मुख्य धरम के प्रति विमुखता. भारत में इसके मायने इन पार्टियों के लिए सिर्फ इतनी है कि हिन्दू धर्म की सभी गतिविधियों का विरोध करो और वोट लो. 

अब बताइए क्या यह जायज है, खैर हम अपने वास्तविक मुद्दे पर आते हैं, क्या भारत क्रांति की और बढ़ रहा है, श्री रामदेव और अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन को देखे तो लगता है कि हाँ. जनमानस खड़ा हो रहा है और हर भारतीय आन्दोलन कि तरह बहुत सा जन समूह इसका विरोध कर रहा है. अभी तक तो मुझे पूरा विश्वास नहीं था पर कांग्रेस के ४ जून कि रात्री के किये दमन ने इसे हवा जरुर दे दी है और भारत अपने सबसे बड़े आंदोलनों में से एक कि और बढ़ रहा है. पर हर आन्दोलन का एक नेता तो होता ही है, बिना नेता की क्रांति कितनी भी बड़ी क्यों न हो सफल नहीं हो सकती, १८५७ की भारत की क्रांति इसका उदाहरण है, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, मंगल पण्डे आदि अनेक वीरों के होने के बावजूद भी क्रांति असफल रही. 

प्रश्न यहाँ पैदा होता है, कहाँ है इस क्रांति का नेता? नेता वैसे तो भारत में पैदा होते नहीं जिनका जमीर पवित्र हो, और अगर कोई आ भी जाए तो उसका दमन कर दिया जाता है, जैसा ४ जून को भारत में हुआ. अब यह प्रश्न मैं आप पर छोड़ता हूँ, कहाँ है क्रांति का नेता जो भारत के जन मानुष को खड़ा कर सके. कांग्रेस का पतन फिर से निश्चित है, पर भारत पर राज कौन करेगा सुषमा जी या जेटली जी जिनकी आपस की लड़ाई का अक्सर उपहास बनता है. नरेंद्र मोदी जी, जिन्हें दुसरे राज्यों की सरकारें प्रचार तक नहीं करने देती, नितीश जी एक सर्व मान्य नेता हो सकते हैं पर उनकी पार्टी इतनी बड़ी नहीं है की भारत में अपना परचम लहरा सके. कौन होगा नेता? कौन बदलेगा भारत को और उसे एक परिवार के राज से मुक्ति दिलवाएगा जिसका एक युवराज बैठक में बैठकर राजनीति सीख रहा है. भारत पर ९० प्रतिशत समय राज करने वाले इस परिवार से कोई पूछे तो भारत के इस हाल का जिम्मेदार कौन है? 

क्रांति हो या न हो पर भारत को इसकी आवश्यकता जरूर है. पर जरूरी है परस्पर भेदभावों को छोड़ कर एक सर्व मान्य नेता चुनना और भारत को लज्जित करने वाले और घटनाक्रमों से बचाना जिनकी भरमार है पिछले २ साल.

---रविन्द्र सिंह ढुल  

Monday, April 2, 2007

Confused

I don't knw why but the so called modernisation moment is taking india to the heads and everyone is making him self modern just by denying the values on which the culture of India was really setted up. go to any place and do anything you want u will find thousands of fools on the roads who are just making joke of the Indian culture. frankly i am also in favor of the liberalisation but do any body here knows what is the meaning of liberalisation. to become liberal we must actually open up our mind to accept all the new thoughts without actually hurting our original thoughts. everybody of us do have our original thought and it must be retained no matter than what u read or actually speak. by rejecting our national languages, our dresses, our religion i don't think what actually we indians want to show to the world. we have to actually change ourself before everything which was retained by us in our past will be vanished and india will actually loss one f it's real and original quality, that we are leaders of the world as far as thought is concerned...
..D..