Friday, September 16, 2011

नई शुरुआत

ज़मीर कांप ही जाता है आप कुछ भी कहें,
वो हो गुनाह से पहले या हो गुनाह के बाद.

एक शायर ने जब यह लिखा होगा तो शायद उसके दिलो-दिमाग में बहुत पवित्र विचार भरे होंगे, वरना आज के दिन ज़मीर की बात करना भी बेमानी हो चला है. भ्रष्टाचार हमारे अन्दर इतनी बुरी तरह से घर कर चुका है कि विचारों की पवित्रता की बात करने वाले की तो खिल्ली उडाई जाती है. क्या यह विडम्बना नहीं है. हमारी शिक्षा व्यवस्था में नैतिक शिक्षा का कोइ स्थान नहीं है इसलिए ही हमारे नौजवान इमानदारी, पवित्रता, नैतिकता जैसे शब्दों की कीमत नहीं जानते. क्या हम कुछ कर पायेंगे इसे बदलने के लिए. 

रविन्द्र सिंह

Saturday, August 20, 2011

सेठ के चार सेवक और "लोकपाल"


एक कथा प्रस्तुत कर रहा हूँ, ये मुझे एक परम मित्र ने पिछले दिनों सुनाई थी. एक सेठ था जो हर रोज रात को एक किलोग्राम दूध पीता था. उसने अपने बुढापे के कारण एक सेवक रख लिया. उस सेवक का कार्य केवल रात को दूध गर्म करके सेठ को देना था. उस नौकर ने कुछ ही दिन में गड़बड़ शुरू कर दी. वह रात को एक पाव दूध स्वयं पी जाता और बाकी सेठ को पानी मिला के दे देता. सेठ को कुछ न सूझी, उसने एक और सेवक रख लिया, उस सेवक का काम था पुराने नौकर को देखना कि कहीं वह गड़बड़ तो नहीं कर रहा. अब दोनों आपस में मिल गए और सेठ को केवल आधा किलो दूध मिलता. सेठ बड़ा परेशान हुआ, कुछ सूझता न देख उसने एक सेवक को रख लिया और दोनों सेवकों को उसके अन्दर कर दिया. अब तीनो ने मिल बाँट कर दूध पीना शुरू कर दिया और सेठ को केवल एक पाव दूध देते. सेठ बेहद परेशान हो गया और उसने एक सेवक रख लिया अपने बाकी भ्रष्ट सेवकों के ऊपर. उसे जिम्मेदारी दी गयी कि अपने तीन सेवकों के भ्रष्ट आचरण पर नज़र रखे और समय पर सेठ को बताए. उस सेवक ने पहले तो तीनों सेवकों को देखा, सेठ को अपने विश्वास में लिया और फिर अपना हिस्सा माँगा. जब तीनों ने बताया कि वे कैसे सेठ को बेवक़ूफ़ बना रहे हैं तो चौथा सेवक बोला अब सेठ को कोई दूध नहीं देगा. योजना अनुसार चौथे सेवक ने सेठ को दूध नहीं दिया. थका हुआ सेठ रात को दूध का इंतज़ार करते हुए सो गया. सोने के बाद चौथे सेवक ने सेठ के होठों पर मलाई लगा दी. सुबह उठने के बाद सेठ ने सबसे पहले दूध की बात पूछी तो सेवक ने बताया सेठ जी अपने मूंह पर लगी मलाई देख लो, रात को आपने दूध पिया तो था, पर शायद आप भूल गए. 

अब सोचिये, कहीं आपका लोकपाल सेठ के चौथे सेवक की तरह तो नहीं है. क्या नैतिक उत्थान के बिना राष्ट्र का उत्थान संभव है? मेरा उत्तर "नहीं"  होगा.

Friday, June 24, 2011

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी ! /नागार्जुन

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

आओ शाही बैण्ड बजायें,
आओ बन्दनवार सजायें,
खुशियों में डूबे उतरायें,
आओ तुमको सैर करायें--
उटकमंड की, शिमला-नैनीताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चांदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

सैनिक तुम्हें सलामी देंगे
लोग-बाग बलि-बलि जायेंगे
दॄग-दॄग में खुशियां छ्लकेंगी
ओसों में दूबें झलकेंगी
प्रणति मिलेगी नये राष्ट्र के भाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

बेबस-बेसुध, सूखे-रुखडे़,
हम ठहरे तिनकों के टुकडे़,
टहनी हो तुम भारी-भरकम डाल की
खोज खबर तो लो अपने भक्तों के खास महाल की !
लो कपूर की लपट
आरती लो सोने की थाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो
दायें-बायें खडे हज़ारी आफ़िसरों से प्यार लो
धनकुबेर उत्सुक दीखेंगे उनके ज़रा दुलार लो
होंठों को कम्पित कर लो, रह-रह के कनखी मार लो
बिजली की यह दीपमालिका फिर-फिर इसे निहार लो

यह तो नयी नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूं मलका, थोडी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेडो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की !
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !



...नागार्जुन

Wednesday, June 15, 2011

मेरे भारत का मशहूर तमाशा.

मेरे भारत का मशहूर तमाशा.

मेरे भारत में कुछ ख़ास है,
प्याज से सरकार बदलती है, दंगों से सरकार बनती है,
नौकरी का फैंसला पैदा होने पर होता है,
लिंग का फैंसला पैदा होने से पहले होता है,
गरीब की तकदीर में तो बहुत कुछ ख़ास है,
पहले हाथ जुड्वाता है बाद में हाथ जोड़ता है.
मेरे भारत में कुछ ख़ास है.

जनता यहाँ गाली देती है पर कुछ बदलती नहीं,
एक धर्म को गाली देना यहाँ धर्मनिरपेक्षता है,
अंग्रेजी बोलने को लोग बड़ा मानते हैं,
पर १२ कोस पर यहाँ बोली बदलती है,
हर प्रदेश की अपनी वेश भूषा है,
किस्मत फिर भी पेंट-कोट से बदला करती है.

मेरे भारत में कुछ ख़ास है,
यहाँ तकदीरें पुरुषार्थ से नहीं जुगाड़ों से बदला करती है.

---रविन्द्र सिंह ढुल, जींद, दिनांक: १५-०६-२०११ 

मैं क्यों खड़ा हूँ?

मैं क्यों खड़ा हूँ?

भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन में आम आदमी क्यों खड़ा रहा? यह प्रश्न अब आम हो गया है. एक छोटी सी कविता इस बात को लेकर मैंने रची है. 

समाचारों में देख कर चुन्नी लाल जी एक दिन जा पंहुचे धरने पर,
उन्हें देख पड़ोस के नेता जी परेशान,
पुछा तुम क्या करोगे चुन्नी लाल?
तुम न तो सामजिक कार्यकर्ता हो,
तुम न ही कोई सर्वमान्य नेता हो,
तुम्हारी गर कोई परेशानी है तो कह डालो,
अनशन धरने पर बैठ अपने ऊपर बोझ न डालो.

क्या तुम्हें किसी ने सरकार के विरुद्ध खड़ा किया है,
लगता है है विपक्ष ने तुम्हारा इस्तेमाल किया है,
मेरी बात मानो अपने घर को जाओ,
राजनीति नेताओं का काम होती है,
आपके लिए नहीं.

अब तक ठठक से गए चुन्नी लाल जी सोचने लगे,
क्या मैं इस देश में चलने लायक हूँ?
क्या मैं इस देश के अन्दर कुछ बोलने लायक हूँ?
क्या इस देश में अपनी आवाज उठाना राजनीति है?
क्या मैं राजनीति करने लायक हूँ?

तभी भीतर से आवाज आई,
चुन्नी लाल....!
तुम एक आम आदमी हो, 
आम आदमी, तुम्हारे मत से नेता बनेंगे,
आगे जाके तुम्हारा खून पियेंगे,
फिर कहेंगे तुम्हें अधिकार कहाँ कानून तोड़ने का,
फिर हवालात में जाने से अच्छा अपने घर जाओ और भारत का मशहूर तमाशा देखो,
जहाँ आम आदमी की बातें तो होती हैं, पर उसकी सुने बिना.

---रविन्द्र सिंह ढुल, जींद, दिनांक: १५-०६-२०११ 

Tuesday, June 14, 2011

मेरी जाति "आम आदमी" है.

मेरी जाति "आम आदमी" है.

सड़क पर फटे हाल एक पुरुष को खड़ा देख,नेता जी रुके,
उनसे पूछा,
तुम कौन हो भाई,
बड़े गरीब और पिछड़े हुए लगते हो,
कितने पढ़े लिखे हो, क्या करते हो,
परिवार में कौन कौन है, क्या क्या करता है,

तुम गरीबी रेखा से नीचे हो?
अगर हो तो तुम्हें चावल मिलेगा, तेल मिलेगा घर मिलेगा,
तुम पिछड़ी जाति के हो, अगर हो तो तुम्हें छात्रवृति मिलेगी,
नौकरी मिलेगी, प्रोत्साहन मिलेगा,

तुम अनुसूचित जाति के हो?
अगर हो तो तुम्हें सरकार नौकरी देगी, बच्चों को पढ़ाएगी,
सब कुछ तुम्हें मुफ्त मिलेगा, तुम बोलो भाई तुम कौन हो?

तुम महिला होते तो तुम्हें अलग से खड़े होने का मौका मिलता,
आरक्षण मिलता, सब कुछ मिलता, पर तुम कुछ बोलते नहीं, कुछ बोलो!

इतनी देर से परेशान वो पुरुष बोला,
नेता जी,
बड़ा दुःख है मुझे कि मैं इनमें से कुछ नहीं,
पर आप समझ पायेंगे ही नहीं मैं क्या हूँ,
भारत की सभी सरकारें मेरे नाम से मत लेती हैं,
मेरा नाम हर घोषणा पत्र में होता है, मेरे नाम से सब आगे बढ़ते हैं,
आपने भी कभी न कभी मेरी जाति का नाम जरूर सुना होगा,
पर दुःख है कि यहाँ मुझे पूछने वाला कोई नहीं,
मैं भूखा हूँ, अनाज नहीं मिलता,
मेरे बच्चे पढना चाहते हैं पर उन्हें दाखिला नहीं मिलता,
मैं पढ़ा लिखा हूँ, मुझे काम नहीं मिलता,
रहने को छत नहीं, पर मुझे घर नहीं मिलता.

नेता जी हैरान परेशान देखते रहे,
वो पुरुष बोलता रहा,

नेता जी मेरी जाति"आम आदमी"  है,
इस देश में सबको सब कुछ मिलता है,
पर मुझे कोई नहीं पूछता,
हर चुनाव में मैं मत का प्रयोग करता हूँ,
मेरे मत से सरकार बदलती है,
पर मैं पचास साल पहले भी भूखा था,
आज भी हूँ.

मैं आम आदमी हूँ, 
क्या आप मेरी सहायता करेंगे?

नेता जी अनमना सा मूंह लेकर अपनी गाडी में चले गए,
और आम आदमी अगले नेता जी कि गाडी का इंतज़ार करने लगा.

-----रविन्द्र सिंह ढुल, १४-०६-२०११, जींद  


सरकार और आम आदमी...

मैं खड़ा हूँ,
मेरा अंतर्द्वंद मुझे जीने न दे रहा है,
जब सारा भारत खड़ा है तो मैं क्यों सो रहा हूँ?
ऐसा सोच आम आदमी एक दिन सारे भारत के साथ धरने पर बैठ गया,
सुबह पत्रकारों ने आम आदमी को नेता घोषित किया,
दोपहर आम आदमी को भारत का भविष्य घोषित किया,

शाम आई और आम आदमी ने बैठकर सोचा,
मेरी सरकार शायद आम आदमी की सरकार है,
मेरे दुःख से शायद किसी को सरोकार है,
जब-जब मैंने उठना चाहा, बाँध हाथ बिठा दिया,
जब-जब मैंने उड़ना चाह, बाँध पंख बिठा दिया,
शायद वह पुरानी यादें, अब बस यादें हैं.
इसी उधेड़ बुन में वह आम आदमी, सो गया.

उठ सुबह जब हुआ नया सवेरा,
प्रभात की किरणों ने आम आदमी का चेहरा जगमगाया,
आम आदमी ने खुद को सड़क पर पाया,
न पेट में अनाज, न तन पर कोई कपडा,
कहाँ गया जो मेरे पास था मेरा रैन बसेरा,

टूटा दिवा स्वप्न तो उसे याद आया,
कल था चुनाव, आम आदमी राजा था,
आज है आम आदमी की नयी सरकार,
और आम आदमी फिर से हाथ बाँध कर नए सवेरे को याद कर रहा है.

"सोच सोच कर मैंने सरकार बनायीं, पर फिर भी इतनी अक्ल मुझे न आई,
सरकार आम आदमी के लिए नहीं, सरकार आम आदमी से बनती है.
कार्य तब भी वह अपने लिए करती थी, कार्य अब भी वह अपने लिए ही करती है."

-रविन्द्र सिंह ढुल/२५.१२.२०११